Friday, 29 August 2014

जिंदगी को कुछ इस तरह जीना चाहती हूँ



जिंदगी को कुछ इस तरह जीना चाहती हूँ
मंद मस्त हवाओं  में
भीनी -भीनी खुशवू के जैसी
विखर जाना चाहती हूँ

जिंदगी को कुछ इस तरह जीना चाहती हूँ
नीले -नीले आकाश में
चह चहाते पक्षियों के जैसी
उड़ जाना चाहती हूँ

जिंदगी को कुछ इस तरह जीना चाहती हूँ
मीठे -मीठे स्वर में
मधुर संगीत के जैसी
वीणा के तारो से जुड़ जाना चाहती हूँ

जिंदगी को कुछ इस तरह जीना चाहती हूँ
 घनघोर बादलों में
काली - काली घटाओं के जैसी
बरस जाना चाहती हूँ

जिंदगी को कुछ इस तरह जीना चाहती हूँ
हरी भरी जमीं में
प्रकृति की नैसर्गिक  सुंदरता के जैसी
बिछ  जाना चाहती हूँ

कल्पना सिंह
kalpanamadhurmani.blogspot.in

Wednesday, 13 August 2014

मा के आॅचल से निकली
पापा की उंगली पकङ कर खङी हो गई
अब मै ये समझी कि मै बङी हो गई
ममता की छाव मे पली
मां के संस्कारों मे ढली
मै अपने आॅगन की कली हो गई
अब मै ये समझ कि मै बङी हो गई
चहचहाती चिङियो सी फुदकने लगी
यौवन के रंग मे रंगने लगी
मै भटकते भ्रमरो की कुमुदनी हो गई
अब मै ये समझी कि मै बङी हो गई

Tuesday, 5 August 2014

यह सच है हकीकत है मेरे दोस्त
तुझको दिल की गहराईयों से चाहा है

गम कितने भी आ जाएं जिन्दगी मे
तेरे लिए खुशी का संसार चाहा है

मुझ पर कितनी भी मुश्किले आएं
पर हर पल तेरा करार चाहा है

 दुनियां के यकीन की ख्वाहिश नही
मैने तो तेरा एतवार चाहा है

कल्पना सिहं
आत्मा अजर अमर है


जीवन की है यह पूणॆ सत्यता
मनुष्य तो नश्वर है 
आत्मा अजर अमर है
जो जन्मा है इस धरती पर 
उसकी मृत्यू निश्चित है 
आत्मा अजर अमर है