Sunday, 20 July 2014

निर्भया के लिए  समर्पित


नारी थी वो नारी थी
सुन्दर थी वो बड़ी प्यारी थी
माँ,बेटी वो बहना थी 
शर्म तो उसका गहना थी 
वो सुने आगाँ की छवि न्यारी थी 
नारी थी वो नारी थी
कितना उसको लाचार किया
उसकी अस्मत पर प्रहार किया 
वो अँधेरे जीवन की उजियारी थी 
नारी थी वो नारी थी 
घर उसका बर्बाद किया 
आत्मा को उसकी तार- तार  किया 
वो घर की छटा निराली थी 
नारी थी वो नारी थी 
सुन्दर थी वो बड़ी प्यारी थी

कल्पना सिंह

Friday, 18 July 2014



कही ख़ुशी है तो कही ग़मों का है साया 

कही ख़ुशी है तो कही ग़मों का है साया
खुशियों में तो जीना चाहता है जीवन सारा
पर दुखों से पाना चाहता है छुटकारा
कही धुप है तो कही छाया
कही प्यार है तो कही नफरत का है साया
प्यार के बिना जीवन में होता नहीं गुजारा
नफरत को प्यार से जीतने का मजा है न्यारा
कही मातम है तो कही शहनाई का बाजा
कही जिंदगी है तो कही मौत का है साया
जिंदगी मिली है तो शान से कर जीने का इरादा
पता नहीं कब मौत आ जाए लेकर पैगाम हमारा

 कल्पना सिंह
kalpanamadhurmani.blogspot.in

 तेरा है,न मेरा है

दुनिया में न कुछ तेरा है,न मेरा है
जिंदगी ख़ुशी और ग़मों का डेरा है
चिराग लेके घुमते है रोशनी की चाह में
चिराग बुझते ही अँधेरा है
रातों को देखते हैं हसीं ख्वाव
आँख खुलते ही सवेरा है
यह वो दुनिया है जहाँ कुछ वाकी नहीं रहता
हर व्यक्ति की किस्मत में लम्हों का वसेरा है

                     कल्पना सिंह
kalpanamadhurmani.blogspot.in

Thursday, 17 July 2014



                               दर्द

अपना दर्द हम यहाँ किसको दिखाएँ 
अपने ग़मों की कहानी यहाँ किसको सुनाये
यहाँ तो हर जगह छल, कपट और धोखा है
सच्चाई के साथ हमारे दर्द को बांटे
ऐसा दोस्त कहाँ से लांए 
हम तो प्यार ही प्यार चाहते है जिंदगी में 
मगर जिंदगी से इस नफरत को हम कैसे मिटायें 
जिंदगी काट रहे हैं इस आस के भरोसे 
खुशियां ही खुशियां होंगी हमारे भी जीवन में  
मगर इन खुशियों को सजों सके 
इतनी फुरसत कहाँ से लाएं 
           
 कल्पना सिंह 

Tuesday, 15 July 2014


मैंने तुमको कितना चाहा

मैंने तुमको कितना चाहा, कब तुम ये जान पाओगे 
मेरे मन के भावो को, तुम कब पहचान पाओगे 
मेरे हृदय पर अंकित है, तेरा प्यारा सा चेहरा 
मेरी आँखों पर भी रहता है, तेरे ख्वावो का ही पहरा 
खुद को कितना रोकना चाहो, पर नित्य मेरे सपनो में आओगे 
मैंने तुमको कितना चाहा, कब तुम ये जान पाओगे 
तेरे मीठे बोल प्यार के, मेरी साँसों में वसे रहेंगे 
तेरे प्यार में मेरे प्रिय, ये जाने कितनी बार कविता कहेंगे 
मेरी इस प्यारी कल्पना को, तुम कब साकार बनाओगे 
मैंने तुमको कितना चाहा, कब तुम ये जान पाओगे 
प्यारी -प्यारी ध्वनि तुम्हारी, मुझको नित्य सुनाई देगी 
हर पल तेरी ही सूरत, इन आँखों में वसी रहेगी 
मधुर मिलन के सुखद पलों को, तुम कब पहचान पाओगे 
मैंने तुमको कितना चाहा, कब तुम ये जान पाओगे 

                       कल्पना सिंह



जिंदगी 

जिंदगी तो खूवसूरत है, पर उसे जीने का नजरिया चाहिए
रोते हैं सब दुःख में, पर दुःख में  कोई हसने बाला भी चाहिए
जिंदगी को मायूस मत समझ मेरे दोस्त,
 जिंदगी को जी ले तू फुर्सत से
कुछ ही लम्हे चाहे ख़ुशी के, तू जी ले इन्हे फुर्सत से
न बार-बार तू कह किसी से टाइम नहीं है  मेरे पास
टाइम तो तेरे पास तेरे खुद के लिए भी नहीं है
टाइम तो तुझे निकलना होगा
 किसी और के लिए ना सही अपने लिए
नहीं तो तू एक दिन अपनी ही पहचान भूल जायेगा
                           कल्पना सिंह

ओ मन ! तुम तो व्यर्थ ही रोते हो 

आँखों से आंसू तुम हर पल क्यों बहते हो
ओ मन ! तुम तो व्यर्थ ही रोते हो
साथ दिया कब किसने जग में,सबने ही मुख मोड़ा है
खुद अपनी कोमल काया ने भी हमसे नाता तोड़ा है
फिर इस झूठे भ्रम में फसकर अपना चैन क्यों खोते हो
ओ मन ! तुम तो व्यर्थ ही रोते हो
यह संसार भ्रम जाल है कैसा
प्रतिदिन फसता प्राणी ऐसा
लीन हुए इस जग में  इतने
भूल गए उस कर्तव्य को अपने
जीवन की अनमोल घड़ियों  को क्यों बेकार में खोते हो
ओ मन ! तुम तो व्यर्थ ही रोते हो
                     कल्पना सिंह

Monday, 14 July 2014


ओ माटी के पुतले 

यहाँ हर आदमी जिंदगी की उधेड़ बुन में लगा हुआ है
जिसने हमें जिंदगी दी है उसी को भूल गया है
काम क्रोध मोह माया में इतना लिप्त हुआ है
कि एक दिन इस संसार को छोड़ के जाना पड़ेगा
 यह भी भूल गया है
पाप कर्म  करने से तू घबराता नहीं
पश्चताप के भी दो आँसू तू बहाता नहीं
किसी न किसी दिन वो दिन भी आएगा
तू भी इस संसार को छोड़ के जायेगा
पाप कर्म से कमाया धन तेरे काम न आएगा
कौड़ी- कौड़ी जोड़ के बचाया धन यहीं रखा रह जायेगा
तू खाली हाथ आया था बन्दे खाली हाथ ही जायेगा
ओ माटी के पुतले तू माटी में ही मिल जायेगा

                     कल्पना सिंह

Sunday, 13 July 2014



 क्रोध 

मन के विरुद कोई बात हो तो आता है हमें क्रोध
क्रोध को शांत करने की तुम भी कर लो शोध
क्रोधित व्यक्ति जीवन में कुछ ऐसा कर जाता है
जिसके लिए उसे जन्म भर पछताना पड़ता है
क्रोध एक विकार है इसे विचार मत समझो
विचार बिना मनुष्य को पशु समान समझो
क्रोध  व्यक्ति का पल भर में कर देता है नाश
इससे से निजात पाने के लिए खींचो लम्बी सांस

                        कल्पना सिंह

Saturday, 12 July 2014

गम और ख़ुशी

गम और ख़ुशी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं 
गम आते ही ख़ुशी चली जाती है
ख़ुशी को ही बना मकसद जिंदगी का 
ख़ुशी को हर समय रख कायम 
फिर हिम्मत क्या है गम की 
जो खुश दिल व्यक्ति के दिल को घेरे 
                     कल्पना सिंह 

Friday, 11 July 2014

सच्चा प्यार हमेशा अंतर में होता है जब आप प्यार का प्रदर्शन करने की कोशिश करते है तो उसकी गहराई खो देते है

Thursday, 3 July 2014

कभी हमारे नाम  भी  खत आया करते थे 

कभी हमारे नाम  भी  खत आया करते थे
जिन्हे देखकर हम भी मुस्कराया करते थे
खोलते खोलते जिनको हमारा चेहरा खिल जाया करता था
पड़कर उसको प्यार ही प्यार बिखर जाया करता था
अब हमें खत कोई क्यों लिखता नहीं
क्या दो शब्द लिखने के लिए हमारे पास समय नहीं
आखिर क्यों खतों  से सब लोग रूठ गए
इतने प्यार भरे खतों के सिलसिले अचानक टूट गए

                                               कल्पना सिंह 

Wednesday, 2 July 2014


 नई  सुबह

निकल दर्द और गम से कोई और बा त  कर
इस सुहानी सुबह को रोकर न बर्बाद कर 
पोंछ  दे आँखों से आँसू जिंदगी से मुलाकात कर 
एक तारा टूट गया तो क्या आसमान में लांखो तारे है 
दिल में हो अगर आरजू तो जीने के कई सहारे है 
एक राह खो गई तो क्या मंजिले और भी मिल जाएंगी 
दिल में हो अगर होंसला तो मुशकिले  थम  जाएंगी
दिल के गम से खुद को न यू बर्बाद कर
गुजरे कल की यादो से खुद को तू आजाद कर
ले खुदा  का नाम और नई  सुबह की शुरुआत कर

                                        कल्पना सिंह 
मायूस जिंदगी 


कभी -कभी दिल में ये ख़याल  आता है ,
कि इस झूठी  दुनिया में क्यूँ  जिए  जा रहे है। 
झूठी  शान और  शौकत के लिए ,
हम क्या -क्या न किये जा रहे है।  
समाज के बनाये रस्म और रिवाज को निभाने में, 
खुद जख्मी हुए जा रहे है। 
यहाँ  तो हम अपनी सांसे भी ,
दुसरो की मर्जी से लिए जा रहे है। 
इन मतलबी रिश्तों  को प्यार का नाम देकर,
हम तो बस जिंदगी जिए जा रहे है।

कल्पना सिंह 

Tuesday, 1 July 2014

अपने गम में फिर जरा सा मुस्कुराने के लिये।


आज की गजल आप दोस्तों के हवाले-------------

अपने गम में फिर जरा सा मुस्कुराने के लिये।
आज फिर सोचा है तुमको भूल जाने के लिये ॥

मुक्तसर सी जिन्दगी में क्या भरोसा सांस का॥
अपनी तन्हाई सही है दिल लगाने के लिये।

अश्क भी बहता रहे और इश्क भी होता रहे।
सर्त ये भी कम नही है जां लुटाने के लिये ॥

बेबसी रातों की है यादे तो आयेगी मगर॥
बेरूखी रख्खा करो बस जी जलाने के लिये॥

बेवजह इल्जाम के खेलों को ना खेला करो॥
अब नहीं मै खेलता हूं हार जाने के लिये ॥

अब तलक जो भी सिकायत मै युं ही करता रहा॥
ये बहाने है वही बस गम भुलाने के लिये ॥

यूं तो है दुश्वार मुझको दूरियां फिर भी सनम ।
फांसले भी हैं जरुरी पास आने के लिये ॥

राजीव कुमार