कभी हमारे नाम भी खत आया करते थे
कभी हमारे नाम भी खत आया करते थे
जिन्हे देखकर हम भी मुस्कराया करते थे
खोलते खोलते जिनको हमारा चेहरा खिल जाया करता था
पड़कर उसको प्यार ही प्यार बिखर जाया करता था
अब हमें खत कोई क्यों लिखता नहीं
क्या दो शब्द लिखने के लिए हमारे पास समय नहीं
आखिर क्यों खतों से सब लोग रूठ गए
इतने प्यार भरे खतों के सिलसिले अचानक टूट गए
कल्पना सिंह
कभी हमारे नाम भी खत आया करते थे
जिन्हे देखकर हम भी मुस्कराया करते थे
खोलते खोलते जिनको हमारा चेहरा खिल जाया करता था
पड़कर उसको प्यार ही प्यार बिखर जाया करता था
अब हमें खत कोई क्यों लिखता नहीं
क्या दो शब्द लिखने के लिए हमारे पास समय नहीं
आखिर क्यों खतों से सब लोग रूठ गए
इतने प्यार भरे खतों के सिलसिले अचानक टूट गए
कल्पना सिंह
No comments:
Post a Comment