Tuesday, 1 July 2014

अपने गम में फिर जरा सा मुस्कुराने के लिये।


आज की गजल आप दोस्तों के हवाले-------------

अपने गम में फिर जरा सा मुस्कुराने के लिये।
आज फिर सोचा है तुमको भूल जाने के लिये ॥

मुक्तसर सी जिन्दगी में क्या भरोसा सांस का॥
अपनी तन्हाई सही है दिल लगाने के लिये।

अश्क भी बहता रहे और इश्क भी होता रहे।
सर्त ये भी कम नही है जां लुटाने के लिये ॥

बेबसी रातों की है यादे तो आयेगी मगर॥
बेरूखी रख्खा करो बस जी जलाने के लिये॥

बेवजह इल्जाम के खेलों को ना खेला करो॥
अब नहीं मै खेलता हूं हार जाने के लिये ॥

अब तलक जो भी सिकायत मै युं ही करता रहा॥
ये बहाने है वही बस गम भुलाने के लिये ॥

यूं तो है दुश्वार मुझको दूरियां फिर भी सनम ।
फांसले भी हैं जरुरी पास आने के लिये ॥

राजीव कुमार

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