ओ माटी के पुतले
यहाँ हर आदमी जिंदगी की उधेड़ बुन में लगा हुआ है
जिसने हमें जिंदगी दी है उसी को भूल गया है
काम क्रोध मोह माया में इतना लिप्त हुआ है
कि एक दिन इस संसार को छोड़ के जाना पड़ेगा
यह भी भूल गया है
पाप कर्म करने से तू घबराता नहीं
पश्चताप के भी दो आँसू तू बहाता नहीं
किसी न किसी दिन वो दिन भी आएगा
तू भी इस संसार को छोड़ के जायेगा
पाप कर्म से कमाया धन तेरे काम न आएगा
कौड़ी- कौड़ी जोड़ के बचाया धन यहीं रखा रह जायेगा
तू खाली हाथ आया था बन्दे खाली हाथ ही जायेगा
ओ माटी के पुतले तू माटी में ही मिल जायेगा
कल्पना सिंह
No comments:
Post a Comment