ओ मन ! तुम तो व्यर्थ ही रोते हो
आँखों से आंसू तुम हर पल क्यों बहते हो
ओ मन ! तुम तो व्यर्थ ही रोते हो
साथ दिया कब किसने जग में,सबने ही मुख मोड़ा है
खुद अपनी कोमल काया ने भी हमसे नाता तोड़ा है
फिर इस झूठे भ्रम में फसकर अपना चैन क्यों खोते हो
ओ मन ! तुम तो व्यर्थ ही रोते हो
यह संसार भ्रम जाल है कैसा
प्रतिदिन फसता प्राणी ऐसा
लीन हुए इस जग में इतने
भूल गए उस कर्तव्य को अपने
जीवन की अनमोल घड़ियों को क्यों बेकार में खोते हो
ओ मन ! तुम तो व्यर्थ ही रोते हो
कल्पना सिंह
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